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गायत्री तपोभूमि – युगनिर्माण योजना
स्वाध्याय योग युक्तात्मा परमात्मा प्रकाशते। अर्थात स्वाध्याययुक्त साधना से ही परमात्मा का साक्षात्कार होता है ।—महर्षि व्यास

पूज्य गुरुदेव की हिमालय यात्रा

परमपूज्य गुरुदेव का हिमालय से अत्यधिक लगाव था। बचपन से ही वह हिमालय के प्रति आकर्षित थे। उन्हें लगता था कि उनका वास्तविक स्थान हिमालय ही है।  

सन् 1926 में जब उनके कई जन्मों के गुरु स्वामी सर्वेश्वरानंद जी ने उन्हें उनकी पूजा की कोठरी में प्रकाशस्वरूप दर्शन दिया तो उन्हें अत्यधिक प्रसन्नता हुई, वे हिमालय के प्रति और भी अत्यधिक उत्कंठित हो गए।

दादा गुरु ने उनके भावी जीवन संबंधी निर्देशों के साथ यह भी कहा कि वे समय-समय पर उन्हें हिमालय बुलाते रहेंगे। दादा गुरु से मिले लगभग एक वर्ष ही बीता था, उन्हें उनकी ओर से हिमालय हेतु बुलावा आ गया। परमपूज्य गुरुदेव की यह हिमालय की पहली यात्रा थी। दादा गुरु से हिमालय में उनकी भेंट हुई और उन्हीं के आदेश से वे वर्ष पर्यंत तप करके वापस घर आ गए।  

सन् 1960 से 1961 की उनकी हिमालय यात्रा का विशेष वर्णन मिलता है। उन्होंने स्वयं अपने इस यात्रा वृत्तांत को अति सुंदर ढंग से प्रस्तुत किया है, जिसे ‘सुनसान के सहचर’ पुस्तक में प्रकाशित किया गया है।

गायत्री तपोभूमि से विदा होने के बाद वह मात्र 10 दिन शांतिकुंज में रहे। और 30 जून सन् 1971 की रात वहीं से हिमालय के लिए प्रस्थान कर गए।

परमपूज्य गुरुदेव जब-जब हिमालय गए दादा गुरु ने उन्हें भावी जीवन के कार्यों का संकेत किया। हिमालय में वे ॠषिसत्ताओं से मिले और ॠषि परंपरा का बीजारोपण करने का संकल्प दादा गुरु की इच्छा के अनुसार लिया और उसे पूरा कर दिखाया।

हर हिमालय यात्रा में उन्होंने 6 माह से लेकर 1 वर्ष तक कठिन तप भी किया। आर्ष वाङ्गमय के भाष्य का कार्य भी अधिकांश रूप में हिमालय की एकांत तपस्थली में किया। वे हिमालय को ‘अध्यात्म का ध्रुवकेंद्र’ कहते थे। उनका मानना था कि विश्व व्यवस्था का दिव्य संचालन दिव्यतम ॠषिसत्ताओं द्वारा ही होता है। वे ॠषिगण मानवमात्र के कल्याण में सतत तत्पर रहते हैं और मानव को बहुत सारे अनिष्टों - विभीषिकाओं से बचाते हैं।

परमपूज्य गुरुदेव के अलावा माताजी ने भी हिमालय यात्रा की। ॠषियुग्म की हिमालय यात्रा का उद्देश्य तप था, जिसके द्वारा लोक-कल्याण पूरा होता था । आज भी उनकी सत्ता सूक्ष्म एवं कारण रूप से मानवमात्र की सुरक्षा और कल्याण में तत्पर है। 

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